जल गुणवत्ता विश्लेषण प्राधिकरण

भारत सरकार

इतिहास

जल का गुणवत्ता मूल्यांकन एवं प्रबंधन जल प्रबंधन के महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। पर्यावरण एवं स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं के संबंध में बढ़ती हुई चिन्ताओं एवं जागरूकता को देखते हुए कालान्तर में इसे अत्यधिक वैश्विक महत्व दिया गया है।
वर्ष 2002 में भारत सरकार द्वारा अंगीकृत राष्ट्रीय जल नीति में भी जल की गुणवत्ता को पर्याप्त महत्व दिया गया है। इसमें इस बात पर बल दिया गया है कि जल की गुणवत्ता को बेहतर करने के लिए देश में सतही एवं भूजल के प्रदूषण का उन्मूलन करने के लिए मौजूदा कार्यनीतियों में सुधार एवं सशक्त विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर आधारित नई प्रविधियों के नवप्रवर्तन की जरूरत है। इस नीति में उल्लेख है कि जल संसाधनों के विकास एवं प्रबंधन को मात्रा एवं गुणवत्ता वाले पहलुओं तथा पर्यावरणिक विचारों को शामिल करते हुए चिरस्थायी इस्तेमाल हेतु सतही एवं भूजल को ध्यान में रखते हुए जलविज्ञानी एकक जैसेकि समग्र रूप से जल अपवहन घाटी या किसी उप-नदी घाटी के लिए बहुक्षेत्रीय ढंग से नियोजित किया जाना होगा। इस नीति में सतही जल एवं भूजल दोनों की गुणवत्ता की नियमित मानीटरिंग; जल की गुणवत्ता में सुधार के लिए एक चरणबध्द कार्यक्रम; बहि:प्रवाही  धाराओं को प्राकृतिक धाराओं में प्रवाहित करने से पूर्व स्वीकार्य स्तरों एवं मानदंडों तक इसका संसाधन प्रदूषित जल के प्रबंधन में “पॉल्युटर पेज” के सिध्दांत का अंगीकरण, जल की गुणवत्ता के अधिक्रमण एवं अपक्षय की रोकथाम करके मौजूदा जलाशयों के परिरक्षण के लिए आवश्यक विधान बनाना अपेक्षित है। इस नीति में यह भी संकेत है कि जल की गुणवत्ता सहित विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान के प्रयासों को हमारे जल संसाधनों के प्रभावी एवं मितव्ययी प्रबंधन के लिए तेज किए जाने की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय पर्यावरण नीति ने सतही जल और भू-जल दोनों, के पानी की घटती हुई गुणवत्ता पर ध्यान दिया। यह नीति ऐसे नदी घाटी के लिए कार्य योजना की सिफारिश करती है जिसमें नदी के घाटी के प्रबंधन संबंधी एकीकृत दृष्टिकोण को बढ़ावा देना शामिल है ताकि सभी मौसमों में नदी के पूरे अपदाह क्षेत्र में जल गुणवत्ता संबंधी मानकों का पालन सुनिश्चित किया जा सके। यह आर्सेनिक, फ्लूराइड और अन्य विषालु तत्वों को हटाने के लिए लागत प्रभावी तकनीकें  विकसित करने के लिए अनुसंधान और विकास स्कीम शुरू करने, विषालु अपशिष्ट पदार्थ के लिए क्षेपण भूमि का अभिनिर्धारण, ताकि भू-जल तक इसकी आवाजाही  से बचा जा सके, इस तरीके से उर्वरकों, नाशक कीट नाशकों तथा कीटनाशकों के प्रयोग को बढ़ावा देना ताकि जल गुणवत्ता विकृत न हो, जैसे कार्यों की भी सिफारिश करती है।
जल गुणवत्ता संबंधी पहलुओं का संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दि विकास उद्देश्य में “पर्यावरण सततता सुनिश्चित करना” में 7 उद्देश्य में से एक लक्ष्य के रूप में भी उल्लेख किया गया है। इसमें सुरक्षित पेयजल और मूल स्वच्छता तक सतत पहँच रहित लोगों के अनुपात को वर्ष 2015 तक आधा करना प्रस्तावित है।